समास किसे कहते हैं? इसकी परिभाषा
जब दो या दो से अधिक शब्द मिलकर अपने बीच की विभक्तियों (जैसे-का, की, के, में, से) को हटाकर एक नया, संक्षिप्त और सार्थक शब्द बनाते हैं, तो उस प्रक्रिया को व्याकरण में समास कहते हैं। ‘समास’ का शाब्दिक अर्थ संक्षेप होता है। इसका मुख्य उद्देश्य भाषा को अधिक संक्षिप्त, प्रभावशाली और सुगठित बनाना है।
उदाहरण के लिए, “घोड़े पर सवार” लिखने के स्थान पर केवल ‘घुड़सवार’ लिखना समास का उत्तम उदाहरण है।
कक्षा 10वीं, 12वीं की परीक्षाओं सहित CTET, UPTET, SSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में समास से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
1. समास को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण शब्द
समास के नियमों और भेदों को जानने से पहले व्याकरण के इन चार तकनीकी शब्दों को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि पूरा अध्याय इन्हीं पर आधारित है:
समस्त पद (सामासिक शब्द):
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से जो एक नया और संक्षिप्त शब्द बनता है, उसे समस्त पद कहते हैं। जैसे: ऋणमुक्त।
समास विग्रह:
समस्त पद को पुनः अलग-अलग करके उसका वास्तविक अर्थ प्रकट करने की प्रक्रिया को विग्रह कहते हैं। जैसे: ऋण से मुक्त।
पूर्वपद और उत्तरपद:
समास से बने शब्द में दो भाग होते हैं। पहले शब्द को पूर्वपद और दूसरे शब्द को उत्तरपद कहा जाता है। उदाहरण के लिए, ‘ऋणमुक्त’ में ‘ऋण’ पूर्वपद है और ‘मुक्त’ उत्तरपद है।
ध्यान रखने योग्य अंतर (समास और सामान्य शब्द)
प्रत्येक दो शब्दों का साथ आना समास नहीं कहलाता। उदाहरण के लिए, ‘नीलगगन’ (नीला है जो गगन) एक समस्त पद है क्योंकि इसका व्याकरणिक विग्रह संभव है। इसके विपरीत यदि हम कहें “ऊँची इमारत” या “ठंडा पानी”, तो ये सामान्य विशेषण और विशेष्य के युग्म हैं। इन्हें समास नहीं माना जा सकता क्योंकि यहाँ दोनों शब्द पूरी तरह स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हुए हैं और इनके बीच किसी विभक्ति का लोप नहीं हुआ है।
2. समास के कुछ महत्वपूर्ण और नए उदाहरण
अक्सर परीक्षाओं में पारंपरिक शब्दों से भिन्न नए शब्द पूछे जाते हैं। आइए कुछ विशिष्ट उदाहरणों के माध्यम से सामासिक शब्दों के परिवर्तन को देखें:
- शरणागत → शरण को आया हुआ (कर्म तत्पुरुष – विभक्ति ‘को’ का लोप)
- अकालपीड़ित → अकाल से पीड़ित (करण तत्पुरुष – विभक्ति ‘से’ का लोप)
- मालगाड़ी → माल के लिए गाड़ी (संप्रदान तत्पुरुष – विभक्ति ‘के लिए’ का लोप)
- मनमाना → मन के अनुसार (संबंध का लोप)
लेखक की सलाह: समास का प्रकार याद करने से पूर्व हमेशा उस शब्द का सही विग्रह करने का अभ्यास करें। यदि आपका विग्रह शुद्ध है, तो आप समास के सही प्रकार को भी बिना किसी भ्रम के आसानी से पहचान लेंगे।
समास के भेद नियम और उदाहरण
अब हम इसके सबसे महत्वपूर्ण भाग पर आते हैं। हिंदी व्याकरण में पदों की प्रधानता और उनके पारस्परिक संबंध के आधार पर समास के 6 मुख्य भेद माने जाते हैं।
आइए, इन सभी भेदों को उनकी परिभाषाओं और विशिष्ट उदाहरणों के माध्यम से समझते हैं:
1. अव्ययीभाव समास
जिस समास का पहला पद (पूर्वपद) प्रधान हो और वह कोई अव्यय या उपसर्ग हो, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। समास बनने के बाद पूरा शब्द क्रियाविशेषण की भाँति कार्य करता है।
पहचान के नियम: इस समास के शब्दों के प्रारंभ में सामान्यतः यथा, प्रति, आ, भर, बे, हर, नि जैसे उपसर्ग जुड़े होते हैं, अथवा एक ही शब्द की आवृत्ति (दहराव) होती है।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
- बेखटके = खटके (डर) के बिना
- यथामति = मति (बुद्धि) के अनुसार
- साफ-साफ = पूरी तरह से साफ
- प्रत्यक्ष = अक्ष (आँख) के सामने
2. तत्पुरुष समास
जिस समास में दूसरा पद (उत्तरपद) प्रधान होता है तथा दोनों पदों के बीच की कारक विभक्ति का लोप हो जाता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। इसका वास्तविक अर्थ विग्रह करने पर ही स्पष्ट होता है।
पहचान के नियम: विग्रह करने पर दोनों पदों के मध्य ‘को, से, के लिए, का, की, के, में, पर’ जैसे कारक चिह्न प्रकट होते हैं।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
- तुलसीकृत = तुलसी द्वारा कृत (रचित)
- रंगमंच = रंगों (नाटकों) के लिए मंच
- स्वर्गप्राप्त = स्वर्ग को प्राप्त
- पापमुक्त = पाप से मुक्त
3. कर्मधारय समास
जिस समस्त पद का उत्तरपद प्रधान हो तथा पूर्वपद और उत्तरपद में विशेषण-विशेष्य (विशेषता बताने वाला और जिसकी विशेषता बताई जाए) अथवा उपमान-उपमेय (जिससे तुलना की जाए और जिसकी तुलना हो) का संबंध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं।
पहचान के नियम: विग्रह करने पर दोनों पदों के मध्य में प्रायः ‘है जो’ या ‘के समान’ जैसे शब्द आते हैं।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
- सज्जन = सत् (अच्छा) है जो जन
- मृगनयन = मृग के समान नयन
- कनकलता = कनक (सोने) के समान लता
- कृष्णसर्प = कृष्ण (काला) है जो सर्प
4. द्विगु समास
जिस समस्त पद का पहला पद (पूर्वपद) संख्यावाचक विशेषण हो और वह संपूर्ण पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता हो, उसे द्विगु समास कहते हैं।
पहचान के नियम: इसका प्रथम पद सदैव एक निश्चित संख्या को दर्शाता है और विग्रह करने पर अंत में ‘समूह’ या ‘समाहार’ शब्द का प्रयोग होता है।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
- सतसई = सात सौ (दोहों) का समाहार
- त्रिवेणी = तीन वेणियों (नदियों) का संगम/समूह
- शताब्दी = सौ अब्दों (वर्षों) का समूह
- पंचतंत्र = पाँच तंत्रों का समूह
5. द्वंद्व समास
जिस समस्त पद के दोनों पद प्रधान होते हैं तथा विग्रह करने पर दोनों के मध्य संयोजक शब्द आते हैं, उसे द्वंद्व समास कहते हैं। इस समास के पद प्रायः एक-दूसरे के पूरक या विपरीतार्थक (विलोम) होते हैं।
पहचान के नियम: लेखन में इन पदों के बीच प्रायः योजक चिह्न (-) का प्रयोग होता है और विग्रह करने पर ‘और’, ‘या’, ‘अथवा’ जैसे शब्द जुड़ते हैं।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
- अन्न-जल = अन्न और जल
- धर्माधर्म = धर्म या अधर्म (संधि युक्त शब्द)
- घृत-अन्न = घृत (घी) और अन्न
- कृष्णाजुन = कृष्ण और अर्जुन
6. बहुव्रीहि समास
जिस समस्त पद में न तो पूर्वपद प्रधान हो और न ही उत्तरपद प्रधान हो, बल्कि दोनों पद मिलकर किसी तीसरे विशेष अर्थ की ओर संकेत करते हैं, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
पहचान के नियम: इसका विग्रह करने पर अंत में ‘जिसका’, ‘जिसकी’ या ‘वह जो’ आता है, जिससे किसी पौराणिक पात्र, देवी-देवता या विशिष्ट संज्ञा का बोध होता है।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
- अंशुमाली = अंशु (किरणें) हैं माला जिसकी अर्थात् सूर्य
- गदाधर = गदा को धारण करने वाले हैं जो अर्थात् हनुमान जी/विष्णु जी
- त्रिलोचन = तीन हैं लोचन (आँखें) जिनके अर्थात् भगवान शिव
- मकरध्वज = मकर का है ध्वज जिनका अर्थात् कामदेव
विशेष बिंदु: कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में अंतर
परीक्षाओं में अक्सर ‘पीतांबर’ या ‘नीलकंठ’ जैसे शब्द देकर परीक्षार्थियों को असमंजस में डाला जाता है। ध्यान रखें, इसका निर्धारण पूरी तरह आपके विग्रह की विधि पर निर्भर करता है:
- यदि आप विग्रह करते हैं: ‘पीला है जो अंबर (वस्त्र)’ $\rightarrow$ तो यह केवल विशेषता बताने के कारण कर्मधारय समास होगा।
- यदि आप विग्रह करते हैं: ‘पीले हैं वस्त्र जिसके अर्थात् श्रीकृष्ण’ $\rightarrow$ तो किसी अन्य विशेष संज्ञा की ओर संकेत होने के कारण यह बहुव्रीहि समास होगा।
परीक्षा हेतु निर्देश: यदि वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के विकल्पों में कर्मधारय औ
अध्याय के अंतिम भाग में हम उन प्रश्नों और अभ्यास प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित करेंगे जो प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। व्याकरण के नियमों को भली-भाँति समझने के पश्चात वस्तुनिष्ठ प्रश्नों (MCQs) का अभ्यास करना परीक्षा में सटीकता सुनिश्चित करने का एकमात्र मार्ग है।
1. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs) – परीक्षा का स्तर
प्रश्न 1. ‘धर्माधर्म’ शब्द में किस समास का विधान है?
(A) अव्ययीभाव समास
(B) द्वंद्व समास
(C) तत्पुरुष समास
(D) कर्मधारय समास
सही उत्तर: (B) द्वंद्व समास (विग्रह: धर्म या अधर्म। ध्यान रखें, योजक चिह्न के बिना भी द्वंद्व समास के पद प्रयुक्त हो सकते हैं)।
प्रश्न 2. ‘मृगनयन’ का शुद्ध समास विग्रह और भेद क्या होगा?
(A) मृग के नयन – तत्पुरुष समास
(B) मृग के समान नयन – कर्मधारय समास
(C) मृग है जो नयन – बहुव्रीहि समास
(D) नयनों का समूह – द्विगु समास
सही उत्तर: (B) मृग के समान नयन – कर्मधारय समास (यहाँ नयनों की उपमा हिरण के नेत्रों से की जा रही है)।
प्रश्न 3. ‘साफ-साफ’ शब्द किस समास के अंतर्गत आता है?
(A) द्वंद्व समास
(B) तत्पुरुष समास
(C) अव्ययीभाव समास
(D) द्विगु समास
सही उत्तर: (C) अव्ययीभाव समास (नियम: जब एक ही शब्द की पुनरावृत्ति हो और वह पद क्रियाविशेषण का रूप ले ले, तो वहाँ अव्ययीभाव समास होता है)।
प्रश्न 4. ‘अंशुमाली’ का सही विग्रह करके समास के भेद का चयन कीजिए
(A) अंशु और माली – द्वंद्व समास
(B) अंशु की माला – तत्पुरुष समास
(C) अंशु (किरणें) हैं माला जिसकी अर्थात् सूर्य – बहुव्रीहि समास
(D) अंशुओं का समूह – द्विगु समास
सही उत्तर: (C) अंशु (किरणें) हैं माला जिसकी अर्थात् सूर्य – बहुव्रीहि समास।
त्वरित अभ्यास तालिका (Revision Table)
नीचे दी गई तालिका में कुछ ऐसे विशिष्ट और नवीन शब्द संकलित हैं, जो आधुनिक प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार पूछे जा रहे हैं। इनका अभ्यास अवश्य करें:
| समस्त पद | सही समास विग्रह | समास का नाम |
| ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त (पृथक होने का भाव) | अपादान तत्पुरुष समास |
| त्रिवेणी | तीन वेणियों (नदियों) का समाहार | द्विगु समास |
| बेखटके | खटके (डर) के बिना | अव्ययीभाव समास |
| सज्जन | सत् (अच्छा) है जो जन | कर्मधारय समास |
| कृष्णाजुन | कृष्ण और अर्जुन | द्वंद्व समास |
| मकरध्वज | मकर का है ध्वज जिनका अर्थात् कामदेव | बहुव्रीहि समास |
परीक्षा कक्ष हेतु महत्वपूर्ण निर्देश
परीक्षा के समय प्रश्नों को हल करते समय निम्नलिखित तीन बिंदुओं का विशेष ध्यान रखें:
- संधि युक्त पदों का विश्लेषण: कई बार परीक्षार्थी योजक चिह्न (-) न देखकर द्वंद्व समास को पहचान नहीं पाते।
- ‘धर्माधर्म’ (धर्म+अधर्म) या ‘शीतोष्ण’ (शीत+उष्ण) जैसे शब्दों में संधि के कारण योजक चिह्न लुप्त हो जाता है, किंतु ये द्वंद्व समास के ही उदाहरण हैं।
- समूह के अर्थ की अनिवार्यता: प्रथम पद संख्यावाचक होने मात्र से ही किसी शब्द को द्विगु समास नहीं मान लेना चाहिए। यदि वह संख्या किसी अन्य संज्ञा की ओर संकेत कर रही है (जैसे: ‘त्रिलोचन’ अर्थात् शिव), तो वहाँ सदैव बहुव्रीहि समास मान्य होगा।
- विग्रह को प्राथमिकता: किसी भी पद का वर्गीकरण करने से पूर्व उसका वाक्य में प्रयोग करके वास्तविक अर्थ समझें। शुद्ध विग्रह ही सही उत्तर तक पहुँचने का सर्वोत्तम साधन है।
निष्कर्ष (Conclusion)
समास हिंदी व्याकरण का एक अत्यंत व्यावहारिक विषय है। इसे रटने के स्थान पर यदि इसके अंतर्निहित नियमों और पदों के पारस्परिक संबंधों को समझ लिया जाए, तो परीक्षा में त्रुटि की संभावना समाप्त हो जाती है। निरंतर अभ्यास और शुद्ध विग्रह ही इस अध्याय पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने की कुंजी है।
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